गुरुवार, 5 जनवरी 2012

प्रकृति के कोलाज



दूर
बर्फ से ढकी
पहाड़ों की धवल
खूबसूरत हिमानी चोटियाँ
इंतज़ार करतीं
सूरज की किरणों का
कब पिघलें ,
जलधार बनें
उड़कर पहुंचें
बादल बन बरसें
मिलकर सागर से
बन जाएँ
वामन से विराट
अपने अस्तित्व का कर विसर्जन |

मोहिनी चोरडिया



जब उतरेंगी तुम्हारी
सुनहरी किरणें, दिनकर
पृथ्वी मुस्कुरायेगी
खेत गीत गायेंगें
कलियाँ चट्केंगी
फूल मुस्कुरायेंगें
नगमें गायेंगीं हवाएं
ठहर जायेंगी फिजाएं
खुशबू बिखरेगी
चारों ओर
प्रेम से भीग जाएगा
जीवन का कण-कण
धन्य हो जाएगा जन-जन |

|मोहिनी चोरडिया

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