शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

परमसत्ता



मौन निःशब्द  रात्रि 
चारों ओर सन्नाटा 
नंगे पेड़ों पर गिरती बर्फ 
रुई के फाहे सी
रात को और भी गंभीर बनाती
शायद तुम्हारे ही आदेश से |

गरजते समुद्र की उफनती लहरें 
प्रलय जैसा दृश्य दिखातीं
खौफनाक मंजर पैदा करतीं 
शायद तुम्हारे ही आदेश से |

गुलाबी भोर, स्याह रात्रि में
विलीन होती 
अपने अस्तित्व का
विसर्जन करती दिखती 
शायद तुम्हारे ही आदेश से |

आज तक समझ नहीं पाया कोई, 
तुम क्या करवाना चाहते हो
किससे ?
दो लोगों के मिलने-बिछुड़ने 
का रहस्य भी 
शायद तुम्हारे ही आदेश से |

अनजान लोगों को
आपस में मिला देना
कब किसकी झोली भर देना, 
कब किसी को खाली कर देना, 
शायद तुम्हारे ही आदेश से |

किसकी मदद से
किसको क्या देना 
गिरने पर
नई दिशा बता देना 
शायद तुम्हारे ही आदेश से |

प्राची में उगता सूर्य और उसकी 
निराली छटा में उड़ते पक्षी 
बिना किसी आवाज़ के, 
ऋतुओं का बदलना 
कली का फूल बनना
शायद तुम्हारे ही आदेश से |

सृजन की सारी प्रक्रियाएँ
तुम्हारे अस्तित्व का प्रमाण देती हैं 
उच्चतम जीवन जीने की कला सिखातीं 
तुम्हारी सारी कृतियाँ 
कितनी पुरातन
फिर भी कितनी नूतन ?
तुमको, तुम्हारे संकेतों को 
हम साधारण मनुष्य 
पढ़ ही नहीं पाते
और कभी पढ़ना नहीं चाहते 
अपने ही अहंकार को साथ लिए 
आगे बढ़ते रहते हैं 
कुछ हाथ न आने पर 
तुम्हारी ही ओर झांकते हैं 
परमसत्ता  को स्वीकारते हैं 
शायद तुम्हारे ही आदेश से |

मोहिनी चोरडिया 



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