गुरुवार, 5 जनवरी 2012

तुम कहाँ हो ?


पता नहीं,
शायद यहीं कहीं ,
नहीं- नहीं ,
यहीं
आसपास ही कहीं ,
क्योंकि ,
तुम्हारी सुगंध ,तुम्हारी सुवास ,
कलियों में चटकती है ,
फूलों में बसती है ,
हवाओं के संग घूमती है |
तुम्हारा अक्स ,तुम्हारी आकृति
कभी बादलों में
कभी पानी में ,
खेतों में , खलिहानों में
या की मुंडेर पर बैठे पक्षी के डेनों में
हर कहीं उतरी दिखती है |

तुम्हारी उपस्थिति
भोर की नीरवता में
सांझ के सुकून में
रात की शीतलता में
विश्राम करती महसूस होती है |
तुम्हारी ऊर्जा
हवा की सरसराहट में ,
पेड़ों की डोलती फुनगियों में
समन्दर की लहरों में
प्रेमी के पैरों में
घुंघरू बाँध नाचती दिखती है |

तुम्हारे होने का प्रमाण
जनमते बालक के रोने में ,
अर्थी के कोने में
मिल ही जाता है |

आस- पास ही नहीं
हर कहीं
तुम हो, तुम ही तो हो |


.
मोहिनी चोरड़िया


पालनकर्ता


भोर
सोया जगता सा जीवन, बस
यही समय है
प्रार्थना करने का
आज के दिन की यात्रा
आरम्भ करने का |

यही समय है ,जब
हाथ उठें उसकी प्रशंसा में
उसके सम्मान में
जिसकी सारी कलाकृतियां
मन को लुभा लेती हैं
आल्हादित कर जाती हैं

चाहे दुधिया नीले पहाड़ों पर
उतरती सुनहरी धूप हो
या सुनहरी रुपहरी, मोतियाँ ,बैंजनी
बादलों से बना क्षितिज़
और उसकी ओट से झांकता
बस वह ही नज़र आता है
संसार का पालनकर्ता
सात घोड़ों के रथ पर सवार |

मुस्कुराते फूल हों और
उत्सव मनाते बगीचे
या गीत गाते खेत
प्रसन्नता से झूमती लहराती
गेहूं की बालियाँ हों
या इतराती नाचती तितलियाँ

तारों की बरात हो
या धवल चाँदनी
अठखेलियां करती चन्दा से
मन को पुलक और आँखों को तृप्ति देते
हर जगह फैले हैं
उसके ही रंग |

कंहीं मंदिर के पट खुलते हैं
तो कंहीं घंटे ,घडियालों की कर्णप्रिय ध्वनि
दूर से आती चितपरिचित सी लगती है
लगता है सुन रही हूँ इन्हें जन्मों से
और सुनती रहूंगी आगे भी
जहाँ भी मैं रहूँ


मोहिनी चोरडिया









प्रकृति



मैं लिखना चाहती हूँ गीत
प्रकृति
तेरी प्रशंसा में,
लेकिन तू तो स्वयं एक गीत है
जीता जागता संगीत है
लयबद्ध , तालबद्ध
छंद है ,गान है
एक अनवरत अनचूक सिलसिला है
जीवन का |
तेरे मौसम से
मेरे जीवन का अटूट रिश्ता है
तेरा मेरा ये रिश्ता पुराना है, जन्मों का
लगता है मैं तेरी ही बाँहों में खेली हूँ
तेरे ही साथ जागी तेरे ही साथ सोयी हूँ
तेरी ताल पर ही मेरे पैर थिरके हैं
तेरे सोंदर्य में ही मेरी आँखें खोई हैं
तेरे ही नज़ारे मेरी नजर में बसे हैं
तेरी ख़ुशी में मैं खुश हूँ
तेरी उदासी मेरी है
तेरी मुस्कराहट मेरी खिलखिलाहट
तेरी टूटन मेरी छटपटाहट है .
तू ही मेरी आकृति ,तू ही मेरा लिबास है
तुझे पहनूं , ओढू या बिछाउ,
तुझसे बातें करूँ ,
तुझे प्यार करूँ या
तुझे बनाने वाले से ,
सुन्दर, अतिसुन्दर अभिव्यक्ति है
तू प्रकृति
मेरे सृजनहार की |


मोहिनी चोरडिया

प्रकृति के संग



चलो, प्रकृति के संग हो लें
नदी झरनों के संग डोलें,
तितलियों के संग बोलें
मूक पशुओं की
आँखों को तोलें
चलो, प्रकृति के संग हो लें ।

पेड़-पौधों की संवेदनाओं को 
अंक में भर लें
धरती की सहनशीलता को
उर में लें
हमारी करुणा की धारा का जल,
इन सबको आप्लावित करे
ऐसा कोई संकल्प
मन में संजों लें।
चलो, प्रकृति के संग हो लें ।

गुलाबों से रिश्ता जोड़ें,
काँटों भरे पथ को भी सह लें
गावों की और जाती
पगडंडियों पर खेलते
धूल धूसरित बच्चों से
नाता जोडें
चलो, प्रकृति के संग हो लें |

इन्द्रधनुष से आकर्षक रंगों को फैलायें,
आवारा बादलों से छन कर आते
प्रकाश में नहायें,
खड़ी फसल की
कच्ची बालियों को सहलायें
मिट्टी के, लिपे पुते घरों के
आंगन की खटिया पर,
कुछ देर सो लें,
चलो, प्रकृति के संग हो लें ।

मोहिनी चोरडिया

भोर

यही समय होता है ,
सुखद एहसास का
जब मैं मन के घोड़ों पर चढ़ी
ऊँचे और ऊँचे पहुँच जाती हूँ
जहां मिलन होता है
प्रकृति की अनमोल धरोहरों से
नीलगगन से बातें होती हैं
तब तक ही लाल रंग की छटा लिये
भगवान भास्कर प्रकट हो जाते हैं
जगत को नहला देते हैं
अपने प्रकाश से
मुझे स्पर्श करते हैं ,
अपनी बाहों में लेते हैं
अपने किर्न्नों का विस्तार कर
कभी बादल मुझे अपने आगोश में
भर लेते हैं
मन का हर कोना जागृत हो जाता है
स्फूर्ति से भर जाता है
तृप्त हो जाता है
पूरे दिन की ऊर्जा मिल जाती है
इसी समय में
नीचे उतरते-उतरते
कर्णप्रिय कलरव पक्षियों का
सुकून देता है कानों को
दिनचर्या के लिये अपने-अपने नीड़ से निकलकर
खुले आसमान में उनकी  पंक्तियों भरी उड़ान
प्रफुलित कर जाती है मन को
और  नीचे आने पर
हरित वस्त्रों पर रंगीन फूलों का लिबास पहने
प्रसन्न वदन  धरती  खिली खिली सी
जैसे मिलन हो गया हो प्रियतम से
प्रकृति की ये मनमोहक छटाएं
भर देती हैं मन को
सुकून से
पुलक से
आनंद से |

मोहिनी चोरडिया

             

प्रकृति के कोलाज



दूर
बर्फ से ढकी
पहाड़ों की धवल
खूबसूरत हिमानी चोटियाँ
इंतज़ार करतीं
सूरज की किरणों का
कब पिघलें ,
जलधार बनें
उड़कर पहुंचें
बादल बन बरसें
मिलकर सागर से
बन जाएँ
वामन से विराट
अपने अस्तित्व का कर विसर्जन |

मोहिनी चोरडिया



जब उतरेंगी तुम्हारी
सुनहरी किरणें, दिनकर
पृथ्वी मुस्कुरायेगी
खेत गीत गायेंगें
कलियाँ चट्केंगी
फूल मुस्कुरायेंगें
नगमें गायेंगीं हवाएं
ठहर जायेंगी फिजाएं
खुशबू बिखरेगी
चारों ओर
प्रेम से भीग जाएगा
जीवन का कण-कण
धन्य हो जाएगा जन-जन |

|मोहिनी चोरडिया

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

नव वर्ष


प्रत्येक नये वर्ष के
आगमन पर हम
यही कहते हैं
नया वर्ष आया
नया सवेरा लाया ,लेकिन
हर बार ही
ऐसा क्यूँ होता है कि
जाग जाने के बावजूद भी
हमारी चेतना पुनः -पुनः
सो जाती है  ?
सतर्कता कहीं गुम हो जाती है
हमारे ही लोग हमें दगा दे जाते हैं
और हम देखते रह जाते हैं
तो जागो दोस्तों

नये वर्ष की दस्तक दरवाज़े पर
सुनाई दे रही है
नये वर्ष को नयी सोच दो
नये वर्ष को नयी बातें  दो

कहो .....अपने आप से ..

रिश्तों की हिफाज़त की
सम्बंन्धों को सरल रखने की
किसी के साथ छल न करने की
अधिकारों के पहले कर्तव्यों की |

कहो  देशवासियों से ....

गोदामों में अन्न न भरने की
विदेशी बैंकों में धन न भरने की
अवैध व्यापार कर दान न देने की
सीमा अवधि पार की दवाइयां न बेचने की |

कहो अपने बच्चों से ...

घोटाला करने वाले मिलते हैं
तो लाल बहादुर शास्त्री भी
यहीं, भारत में ही
पैदा होते हैं |

आतंकवादी पनपते हैं
तो प्रोफ़ेसर डा अब्दुल कलाम भी
इसी देश को
मिलते हैं |

जागरण की बेला है
पुरुषार्थ का समय
चरेवैति-चरेवैति का नाद हो
राष्ट्रहित की फ़रियाद हो ,नव वर्ष पर |

मोहिनी चोरड़िया